न जाने कैसी हो तुम!
तुम रेगिस्तान के रेत की जैसी हो
दिन में दहकती हुई
गुस्सा हो जाती हो,
शब आते आते
शीतल बन जाती हो
न जाने कैसी हो तुम
बर्फ जैसी कठोर
या हवा जैसी चंचल
तारों जैसी
पास होकर भी हजारों मील दूर
या उस नदी जैसी
अपने आप से भागती हुई
न जाने कैसी हो तुम
समंदर जैसी गहरी
या रात जैसी रहस्यमय
हजारों राज अपने अंदर समेटे
मुस्कुराती हुई
न जाने कैसी हो तुम
आंसू जैसी शायद
गम हो या खुशी
हमेशा साथ देने वाली
एक अनजान आवाज
भीतर की
सारे राज खोलती
शायद मेरी किस्मत हो तुम
कभी न समझने वाली !
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